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ढेला और पत्ता

ढेला और पत्ता :वर्तमान स्थिति में यह अतीत की कहानी लगेगी परंतु हम जैसे सीनियर सिटीजन को पुराने जमाने की याद आ जायेगी।
 डॉ प्रेमकुमार पांडेय जी की पोस्ट
अम्मा पढ़ी-लिखी नहीं थीं। सामान्यत: ग्रामीण परिवेश की महिलाओं में किस्सा-कहानी कहने की अद्भुत क्षमता होती है। लेकिन मेरी माँ इस कला से अछूती थीं। हम लोगों के जिद करने पर थोड़ा सुना देती थीं। प्राय: कहानियों की पुनरावृत्ति होती रहती थी। मुझे अम्मा की वह पहली कहानी आज भी याद है – एक ढेला था और एक पत्ता । ढेला और पत्ता में बहुत गहरी दोस्ती थी। एक दिन ढेला पत्ता से बोला कि पत्ता भाई ! पत्ता भाई! जब पानी बरसेगा तो तुम मेरे ऊपर आकर मेरी रक्षा करना । पत्ता बोला क्यों नहीं? बिल्कुल करूँगा। मित्र ही तो मित्र के काम आता है। लेकिन भाई तुम्हें भी मेरी मदद करनी होगी। जब आँधी आए तो तुम मेरे ऊपर आ जाना जिससे मैं उड़ने से बच जाऊँगा। ढेला बोला अरे भाई!  यह भी कोई कहने की बात है। मैं आँधी में तुम्हारी रक्षा करूँगा। लेकिन दैवयोग से ऐसा हुआ कि आँधी और पानी एक साथ आए,ढेला गल गया और पत्ता उड़ गया। कहानी गई वन में सोचो अपने मन में।
यह कहानी हमने अम्मा से सैकड़ों बार सुनी होगी लेकिन कभी पुरानी नहीं हुई । ढेला और पत्ता की कहानी बीज से वाट-वृक्ष हो गई है। आज चालीस साल बाद उस कहानी का रहस्य खुलता है तो लगता है जैसे अम्मा ने तो जीवन का सूत्र ही पकड़ा दिया था। ढेला और पत्ता संकट के समय एक-दूसरे की सहायता से अस्तित्व की रक्षा करना चाहते हैं लेकिन कोई किसी की रक्षा नहीं कर पाता। ऐनवक्त पर दोनों स्वयं संकटग्रस्त हो जाते हैं। जब दो लोगों की दाढ़ी में एक साथ आग लगी हो तो अपनी-अपनी दाढ़ी की आग बुझाना ही बुद्धिमानी होगी। आप स्वयं अपने संकटमोचन हैं। दूसरे से सहायता की आशा करेंगे तो निराश ही हाथ लगेगी। ऐसा भी समय आता है जब सामने वाला चाहकर भी आपकी रक्षा नहीं कर पाता। यह कहानी अम्मा के खजाने की अमूल्यनिधि थी। आज भी समुद्र में प्रकाश स्तम्भ की तरह मार्ग प्रशस्त कर रही है।
आज से पचास साल पहले बच्चों के मनोरंजन के साधन बहुत सीमित थे। बच्चे किस्से-कहानियाँ सुनकर मनोरंजन कर लिया करते थे। कहानियाँ सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं होतीं वरन वे ज्ञान की  संवाहक भी होती हैं। जीवन का गूढ़तम ज्ञान कहानियों के माध्यम से घुट्टी की तरह पिला दिया जाता था। रामायण-महाभारत की कहानियाँ अपने आप जेहन  में उतार जाती थीं।
गर्मी की छुट्टियों में जब स्कूल बंद होने का समय आता तो उससे पहले ही बाबा का पोस्टकार्ड आ जाता था। आज भी वह लिखावट आँखों में तैर जाती है- “ परीक्षा खत्म होते ही बच्चों को भेज दो।“ स्टीम इंजनवाली रेलगाड़ी में तीन-चार जगह गाड़ी बदलते हुए हम भाई-बहन गाँव पहुँचते। हमारा भव्य स्वागत होता। वे बड़े आत्मीयता के दिन थे।
हम लोगों के घर पहुँचने से पहले बाबा हमारे मनोरंजन का पूरा इंतज़ाम करके रखते थे । हमारे बाबा की एक थीं जो पूरे इलाके में कहानियाँ सुनाने के लिए सरनाम थीं। उन्हें हमारे मनोरंजन एवं ज्ञानवर्द्धन के लिए बुलाया लिया जाता था।
बाबूजी की बुआ को शब्दचित्र खड़े करने में महारत हासिल थी। ध्वन्यात्मक चित्रण ध्वनियाँ निकालकर किया करती थीं। मुझे पूरा विश्वास है कि इस टेक्नोलॉजी के युग में वे होतीं तो इस देश में उनसे बड़ा किस्सागो दूसरा नहीं होता। उनका घोडा दौड़ता तो पडरक पडरक । जैसे ही सूर्य डूबता, बुआ बड़े से आँगन में बांसखट पर बैठ जातीं। हम भाई-बहन उन्हें चारों ओर से घेर लेते । सबसे पास बैठकर कथावाचक को छूकर कहानी सुनने का मज़ा ही कुछ और होता है। हुँकारी भरना बहुत ज़रूरी होता था। हुँकारी बंद कहानी बंद।
बुआ की एक कहानी आज भी याद है । एक राजा और एक रानी थीं। उनकी दो लड़कियां थीं। राजा बहुत गरीब थे। भीख माँगाकर गुजारा चलता था। राजा को इस बात का घमण्ड था कि वह अपनी लड़कियों को बहुत अच्छे से पाल रहें हैं।  एक दिन राजा ने दोनों लड़कियों को बुलाकर पूछा कि – “तुम किसके करम का खाती हो ?” बड़ी लड़की ने कहा-“आपके करम का खाती हूँ।“ राजा बहुत खुश हुआ । छोटा लड़की ने कहा- “मैं अपने करम का खाती हूँ।“ राजा क्रोधित हो गया । उसने उसी रात अपनी छोटी लड़की को जंगल में छोड़ दिया। समय बीतता रहा। राजा को भीख मिलना भी बंद हो गई। खाने के लाले पड़ गए। एकदिन खबर मिली कि जंगल की राजकुमारी गरीबों को दान कर रही है। राजा-रानी अपनी बड़ी लड़की के साथ वहाँ दान लेने पहुँचे। भव्य महल, नौकर-चाकर, बाग-बगीचा देखकर दंग रह गए। वह राजकुमारी कोई और नहीं उसी  राजा की छोटी लड़की थी। राजकुमारी ने माता-पिता एवं बहन को पहचान लिया और वे सुखपूर्वक महल में रहने लगे। जैसे राजा के दिन बहुरे वैसे सबके दिन बहुरें। कहानी गई वन में सोचो अपने मन में।
बचपन में यह संदेह होता था कि अगर वे राजा थे तो भीख क्यों माँगते थे? लेकिन आज समझ में आता है कि राजा लोग भीख ही माँगते हैं। वे परजीवी होते हैं। स्वयं कुछ नहीं करते। छोटी बेटी ने पिता के अहंकार को तोड़ा और अपने पुरुषार्थ से अपना साम्राज्य खड़ा किया। बचपन में सुनी कहानियों की विशेषता यह है कि उम्र के हिसाब से स्वयं इनका रहस्य खुलता जाता है साथ ही मार्ग भी आलोकित होता चलता है।
अक्सर हम लोग अम्मा से पूछते कि वो पढ़ीं क्यों नहीं? स्कूल क्यों नहीं गईं? हम लोगों का अनुमान था कि शायद गाँव में स्कूल नहीं रहा होगा और लड़की होने के नाते दूर भेजा नहीं गया होगा। लेकिन इसके विपरीत अम्मा ने बताया कि वे भी स्कूल गई थीं। उन्हें एक मौलवीजी पढ़ाया करते थे।एक दिन मौलवी जी ने एक पैसा फीस  लाने को कहा। घर की मालकिन अम्मा की चाची थीं। माँगाने पर उन्होंने पैसे नहीं दिए। उधर पैसे न मिलने के कारण मौलवीजी ने एक दिन सोटा से पिटाई कर दी। उस दिन से अम्मा का स्कूल जाना बंद। घर से निकलतीं स्कूल के लिए और रास्ते में एक तालब पर रुक जातीं। वहाँ दो-तीन सहेलियाँ मिलकर काई इकट्ठा करतीं, उसका लड्डू बनातीं और स्कूल का समय समाप्त होने पर घर आ जातीं। महीनों यह चलता रहा। एक दिन मौलवी साहब घर पहुँच गए। नानाजी से शिकायत की कि चाँदी स्कूल नहीं आ रही है। अम्मा को बुलाया गया। अम्मा ने नानाजी के सामने साफ घोषणा कर दी – “मैं स्कूल नहीं जाऊँगी” और मौलवीजी को ललकारा कि दियासलाई लेकर तुम्हारी दाढ़ी फूँक दूँगी। इस प्रकार अम्मा की पढ़ाई का अंत हुआ।
क्या आज भी पैसे कमी और स्कूल में दण्ड के कारण विद्यार्थी स्कूल नहीं छोड़ रहे हैं? मेरे ख्याल से स्थितियाँ ज्यों की त्यों हैं। बचपन में अम्मा ने मौलवीजी को ललकारा था । वो ललकार उनकी प्रकृति है। उनकी ललकार हर जगह देखने को मिलती है। अपनी हानि  सहकार भी वे ललकारती रहतीं हैं।
कहानियाँ बच्चों के मानसिक विकास में सहायक होती हैं। लेकिन कितने अभिभावक हैं जो बच्चों को समय देते हैं? नई पीढ़ी का निर्माण भी बहुत बड़ा काम है। इसे संजीदगी से करना होगा। उतनी ही संजीदगी से जितनी संजीदगी से हमारे पूर्वजों ने किया था।
बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध हो गया है। दुधमुहाँ बच्चा आया के संरक्षण में पलता  है और बड़ा टी वी के। उसके हाथ में रिमोट है। उसे यह नहीं मालूम कि उसे क्या देखना चाहिए और क्या नहीं? वह उम्र से आगे सब कुछ देख रहा है- हिंसा,बलात्कार,छल, धोखा और उसे ही जीवन का आधार मान बैठा है।
किस्सागो परंपरा पुन: जीवित की जानी चाहिए। साथ ही पुस्तकें पढ़ने की ललक पैदा करना चाहिए। सुनने और पढ़ने से कल्पना शक्ति का विकास होता है। इस आंधी दौड़ में रुककर विचार करना होगा। यह दौड़ जिसके लिए है उसका विकास कैसे हो रहा है? यदि माता-पिता एवं समाज यह जिम्मेदारी उठाने की स्थिति में नहीं है तो शिक्षकों को जरूर ही उठाना चाहिए। क्योंकि कम से कम हम गुरुजनों से तो त्याग की अपेक्षा कर ही सकते हैं। उन गुरुजनों को मेरा प्रणाम पहुँचे जिन्होंने बचपन में मुझे कहानियाँ सुनाईं ।                                     .                                                                                                                                                                     डॉ  प्रेमकुमार पाण्डेय                                                                                                                                                         केन्द्रीय विद्यालय बीएमवाय

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