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“इस धान की किस्म से जितना उत्पादन आता है, उतना किसी से नहीं आ सकता”- सफल किसान अमृतलाल

 “इस धान की किस्म से जितना उत्पादन आता है, उतना किसी से नहीं आ सकता”- सफल किसान अमृतलाल

कृषि जागरण के #farmerthebrand अभियान के तहत देशभर के सफल किसानों को जोड़ा जा रहा है. कृषि जागरण Farmer The Brand अभियान के तहत सफल किसान की कहानी में अमृतलाल ढन्गर शामिल हैं. ये मध्य प्रदेश के मण्डला जिले के एक प्रगतिशील किसान हैं जिन्होंने अपनी मेहनत और तकनीक से कृषि क्षेत्र में सफलता पायी है. इनकी खेती बरबसपुर विकासखंड बिछिया में है. अमृतलाल का कहना है कि ये पिछले 50 सालों से खेती कर रहे हैं. इन्होंने इस बार धान की स्वर्णा कोस्टल किंग किस्म की खेती की है. यह किस्म 150 दिन में पककर तैयार होती है.

अपनी सफल खेती के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने बताया कि इसकी रोपड़ी 20 जून को की थी. इसके साथ ही उन्होंने 5 जुलाई से धन लगवाना शुरू किया था. उनके मुताबिक यह किस्म उत्पादन के मामले में बाकी किस्मों से सबसे ऊपर है. उनका कहना है कि जितना उत्पादन किसान इस किस्म से ले सकते हैं उतना किसी और किस्म में उत्पादन नहीं मिल सकता.

वे बताते हैं कि इसमें कल्ले  ज्यादा निकलते हैं. 120 से 140  कल्ले तक इसमें निकलते हैं. पिछली साल उत्पादन लगभग 45 कुंटल रहा. उनका कहना है कि धान में जल की ज्यादा जरूरत नहीं होती है, बस नमी बनी रहनी चाहिए. रोपड़ी के बाद किसान अगर खेत खाली कर देते हैं तो, बानी नहीं रहता है तो भी कोई दिक्कत की बात नहीं है. ऐसा करने पर पौधों को पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व मिलेंगे और जड़ें ज्यादा अच्छी तरह से फूट सकेंगी.

इस साल 6 एकड़ के क्षेत्र में धान की खेती करने वाले किसान ने घर में बायो गैस प्नलांट भी लगा रखा है. इससे हर साल 200 क्विंटल खाद मिलती है. वे धान में लगने वाले रोग के बारे में बताते हुए कहते हैं कि उनके क्षेत्र में कंडवा रोग की समस्या ज्यादा है. ऐसे में इसके लिए किसान ट्राइकोडर्मा का उपयोग गोबर खाद के साथ कर सकते हैं. उनका बाकी किसानों के लिए भी यह सुझाव है कि किसान ग्रीष्मकालीन जुताई जरूर करें. इसके साथ ही धान और गेहूं की भूसी खेतों में ही सड़ाकर उसका उपयोग करें. किसान अपनी भूमि के अनुसार ही धान के बीज का चयन करें. इससे उत्पादन अच्छा होने के साथ ज्यादा भी होता है. अगर किसान कतार में बुवाई करते हैं तो उसमें लागत भी कम आती है और पानी भी कम लगता है. इसके साथ ही कृषि यंत्रों का भी उपयोग आसानी से किया जा सकता है.आपके बते दें कि किसान खेती के साथ ही तोतापरी नस्ल की बकरियों के साथ बकरी पालन भी करते हैं.

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